होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है

होम्योपैथी एक विज्ञान का कला चिकित्सा पद्धति है। होम्योपैथिक दवाइयाँ किसी भी स्थिति या बीमारी के इलाज के लिए प्रभावी हैं; बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों में होमियोपैथी को प्लेसीबो से अधिक प्रभावी पाया गया है। होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है।

भारत होम्योपैथिक चिकित्सा में वर्ल्ड लीडर हैं।

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत 1796 में सैमुअल हैनीमैन द्वारा जर्मनी से हुई। आज यह अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी में काफी मशहूर है, लेकिन भारत इसमें वर्ल्ड लीडर बना हुआ है। यहां होम्योपथी डॉक्टर की संख्या ज्यादा है तो होम्योपथी पर भरोसा करने वाले लोग भी ज्यादा हैं।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है। होम्योपैथी में किसी भी रोग के उपचार के बाद भी यदि मरीज ठीक नहीं होता है तो इसकी वजह रोग का मुख्य कारण सामने न आना भी हो सकता है।

होम्योपथी दवा मीठी गोली में भिगोकर देते हैं

होम्योपथी हमेशा से ही मिनिमम डोज के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोशिश की जाती है कि दवा कम से कम दी जाए। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर दवा को मीठी गोली में भिगोकर देते हैं क्योंकि सीधे लिक्विड देने पर मुंह में इसकी मात्रा ज्यादा भी चली जाती है। इससे सही इलाज में रुकावट पड़ती है।

डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं।

होम्योपैथी की सबसे खास बात है कि आप डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं। इससे किसी भी तरह का कोई साइड इफेक्ट होने का खतरा नहीं होता।

थिओसिनामीनम-रोडैलिन THIOSINAMINUM-RHODALLIN

 थिओसिनामीनम-रोडैलिन THIOSINAMINUM-RHODALLIN

परिचय-

तिल के तेल से निकलने वाली एक विशेष प्रकार के रसायनों को होम्योपैथिक तरीके से थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि तैयार की जाती है। इस औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोगों में उत्पन्न लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग दोनों प्रकार से की जा सकती है- बाहरी प्रयोग (लगाना) और सेवन करना। यह औषधि घाव या जख्म के निशान पड़ने, फोड़े होने तथा ग्रंथियों के फैल जाने पर उपयोग में लाई जाती है। पलकों का बाहर की ओर उलट जाना या कनीनिका के आर-पार दिखाई देना, मोतियाबिन्द, जोड़ों में खिंचाव, सूत्रार्बूद (फोड़े से सूत की तरह कीड़े निकलना), त्वचा में खिंचाव होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है। कान में आवाज गूंजना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। कशेरुका मज्जाक्षय (कशेरुका मज्जा का टी.बी. रोग) में झटके की तरह दर्द होने पर इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि पाकाशय, मूत्राशय तथा मलाशय से सम्बंधित रोगों की अंतिम अवस्था में रोग को ठीक करने के लिए थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि 120 ग्राम की मात्रा में लेनी चाहिए। 

शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थिओसिनामीनम- रोडैलिन औषधि का उपयोग :- 

कान से सम्बंधित लक्षण:- इस औषधि का प्रयोग धमनी में खिंचावयुक्त चक्कर आना। कान में आवाज गूंजना। प्रतिश्यायी बहरापन के साथ घाव या जख्म की तरह कान का मोटा हो जाना। कान की परते मोटी होना। स्नायु में किसी सौत्रिक परिवर्तन के कारण बधिरता। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का सेवन कराना चाहिए।

मात्रा :-

ग्लिसरीन और पानी मिला हुआ 10% द्रव्य को 15 से 30 बूंदों की मात्रा में सप्ताह में 2 बार देनी चाहिए। कठिन धमनीकाठिन्य उपसर्गों में 65 या 120 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 3 बार प्रयोग करें। चक्कर आने और जोड़ों में जलन होने पर 2X मात्रा का प्रयोग करें।


थेरीडियम THERIDION

 थेरीडियम THERIDION

परिचय-

थेरीडियम औषधि को स्नायविक चेतना बनाए रखने के लिए लाभकारी माना गया है। इस औषधि के लक्षण और टी.बी. रोग से सम्बंधित लक्षण दोनों ही समान होते हैं। अत: इस औषधि का प्रयोग टी.बी. रोग में करने से यह औषधि टी.बी. से सम्बंधित लक्षणों में तेजी से क्रिया करके रोग को समाप्त करती है। यह औषधि चक्कर आना, उल्टी आने के साथ सिरदर्द होना तथा हृदय के चारों ओर दर्द होना आदि को ठीक करती है। यह औषधि खून जमा होने के साथ उत्पन्न टी.बी. रोग तथा गण्डमाला रोग को ठीक करती है। इसके अतिरिक्त शोर-शराबे को सहन न कर पाना तथा शोर-शराबे में जाने पर ऐसा महसूस होना मानो आवाज की एक तेज तरंग शरीर में घुस गई हो विशेषकर दांतों में यह महसूस अधिक होता। शोर-शराबे से रोगग्रस्त अंग अधिक प्रभावित होते हैं। अत: ऐसे लक्षणों में थेरीडियम औषधि का प्रयोग किया जाता है। हडि्डयों के विकार, हड्डी के टी.बी. रोग, हडि्डयों का गलना। टी.बी. रोग के साथ बाएं फेफड़े के ऊपरी भाग में सुई चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में इसका प्रयोग करना चाहिए। 

शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थेरीडियम औषधि का उपयोग :-

मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी का मन असन्तुलित होने के कारण रोगी का स्वभाव बदलने लगता है। वह हमेशा अशांत रहता है तथा छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता है। रोगी को किसी भी चीज से आनन्द नहीं मिलता तथा उसे ऐसा लगता रहता है जैसे कि समय बहुत तेजी से बीत रहा है। ऐसे मानिसक लक्षणों से पीड़ित रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है तथा दर्द इतना संवेदनशील होता है कि फर्श पर भी चले तो दर्द बढ़ जाता है। सिर चकराने के कारण थोड़ी दूर भी चला नहीं जाता तथा चलने की कोशिश करने पर जी मिचलाने लगता है और उल्टी शुरू हो जाती है। आंखों को बंद करने पर चक्कर व उल्टी के लक्षण अधिक दिखाई पड़ते हैं। ऐसे लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि का सेवन करना चाहिए।

आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों के सामने सफेद रंग का प्रकाश तरंग दिखाई देना तथा तेज प्रकाश में देखने से परेशानी होना। आंखों के गोलक के पीछे दबाव महसूस होना। बाईं आंखों के ऊपर कंपन होना। इस तरह के आंखों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी के नाक से पीले रंग का बदबूदार बलगम अधिक मात्रा में निकलता हो तो थेरीडियम औषधि का सेवन करें। नाक के उपरोक्त लक्षणों मे इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- समुद्र के किनारे रहने वाले लोग जब समुद्री पानी का प्रयोग करते हैं तो समुद्री पानी के कारण आमाशय रोगग्रस्त हो जाता है जिससे रोगी को उल्टी आने लगती है। ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए थेरीडियम औषधि लेनी चाहिए। यदि रोगी को आंख बंद करने पर चक्कर व उल्टी आती है। बाईं ओर प्लीहा के सामने ऊपर की ओर डंक मारने जैसा दर्द होता है तथा जिगर में जलन होता है तो ऐसे आमाशय के लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।

सांस संस्थान सम्बंधित लक्षण :- बाईं छाती में दर्द होना। हृदय में उत्तेजना व दर्द होना। बाईं छाती के पेशी में दर्द होने के साथ ऐसा महसूस होना जैसे छाती की पेशी को कोई नोच रहा है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लिए थेरीडियम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण :- कशेरुकाओं के बीच उत्पन्न दर्द या दबाव को सहन न कर पाने की शक्ति। रीढ़ की हड्डी में दबाव सहन न कर पाने की शक्ति तथा किसी जीव के काटने के कारण विष फैलने से उत्पन्न पीड़ा आदि को दूर करने के लिए थेरीडियम औषधि का प्रयोग किया जाता है।

त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर डंक मारने व चुभनयुक्त दर्द होना। त्वचा पर खुजली महसूस होना तथा जांघों की शक्ति कम होना आदि लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।

वृद्धि :-

रोगग्रस्त अंगों को छूने से, दबाव देने से, जहाज पर, गाड़ी में सवारी करने से, आंखों को बंद करने से, धक्का लगने से, शोर-शराबे से तथा बाईं ओर घूमने से रोग बढ़ता है।

शमन :-

गर्मी से तथा लू लगने से सिर दर्द में आराम मिलता है।

तुलना :-

थेरीडियम औषधि की तुलना कैल्केरिया और लाइको औषधि से की जाती है। इन औषधियों का प्रयोग थेरीडियम औषधि से पहले करने से रोग में जल्द लाभ होता है।

मात्रा :-

थेरीडियम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।


थूजा आक्सिडेण्टैलिस THUJA OCCIDETALIS

 थूजा आक्सिडेण्टैलिस THUJA OCCIDETALIS

परिचय-

थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि विभिन्न रोग के लक्षणों को समाप्त करके रोगों को ठीक करती है। इस औषधि की क्रिया विशेष रूप से त्वचा रोग, जठरान्त्रपथ, गुर्दे और मस्तिष्क पर होती है। यह औषधि रोग के कारण उत्पन्न फोड़े-फुंसी, मांसाकुंरों तथा मस्सों जैसे फुंसियों आदि को ठीक करती है। ठण्ड लगने के कारण बलगम के थक्के बनने पर रोगी को यह औषधि लेनी चाहिए। खून निकलने पर कवकगुल्म (फंगस ग्रोव्थस) तथा जतूक व शिराओं के अत्यधिक सूजन आदि में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की क्रिया त्वचा के अतिरिक्त जननेन्द्रिय पर भी विशेष रूप से होती है। इस औषधि के प्रयोग से जननेन्द्रिय के ऐसे विकृत दशायें उत्पन्न होती है जैसे रक्तदूषित होने के समय होती है। यह औषधि श्लैष्मा तथा त्वचा की परतों पर मस्से जैसे विवर्द्धनों को उत्पन्न हुए गुलर जैसे मस्से और अर्बूदों आदि को ठीक करती है।

थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि में प्रमेह और गोबीज टीका के जीवाणुओं को नष्ट करने वाले लक्षण पाए जाते हैं। इसलिए सूजाक की दबी हुई अवस्था, डिम्बवाहिनियों की सूजन। टीका लगाने के कारण उत्पन्न रोग। प्रमेह-दोष के कारण पेशियों और संधियों में होने वाला दर्द तथा ऐसे लक्षण जिसमें आराम करने पर, सूखे मौसम में, नमी वाले मौसम तथा तर वातावरण में रोग बढ़ता है। ऐसे लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।

लंगड़ापन तथा शरीर की ऐसी प्रकृति जिसमें रक्त अस्वाभाविक रूप से अत्यधिक जलयुक्त होता है। अत: भीगी हवा और पानी से उन्हें अत्यधिक कष्ट होता है। तेज थकावट और शीतप्रधान आदि स्थितियों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। चेचक व फुंसियों को जल्दी ठीक करने के लिए, पूतिज्वर को रोकने के लिए, टीकाजनित धातुदोश जैसे कठिन त्वचा रोग तथा स्नायु का दर्द आदि को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।


शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का उपयोग :-

मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी का मन हमेशा स्थिर और शांत रहता है। वह किसी से बात करना या मिलना पसन्द नहीं करता। रोगी अपने-आप में ही खोया रहता है तथा उसे अपने आस-पास का कुछ भी ज्ञात नहीं रहता। रोगी को देखने से ऐसा महसूस होता है जैसे उसकी आत्मा और शरीर अलग-अलग है। रोगी को अपने पेट में ऐसा महसूस होता है कि कोई जीवित जीव पेट के अन्दर चल रहा है। रोगी अधिक गुस्सैल होता है तथा छोटी-छोटी बातों पर लड़ने लगता है। वह गाना सुनना बिल्कुल पसन्द नहीं करता तथा गाने की आवाज सुनते ही गुस्से के मारे पूरे शरीर में कम्पन होने लगता है। ऐसे मानसिक लक्षणों से पीड़ित रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कोई कील सिर में ठोक दिया हो। चाय पीने से स्नायुओं में दर्द होना। सिर के बाईं ओर दर्द होना। सिर में सफेद पपड़ीदार रूसी होना, बाल सूखना तथा बाल का झड़ना आदि सिर से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि चेहरे के चिपचिपापन को भी समाप्त करती है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों की पलकों के स्नायुओं में दर्द होना तथा परितारिका की सूजन। रात के समय पलकों का आपस में चिपक जाना, पलकों का सूख जाना तथा पलकों पर परतदार पपड़ियां बनना। अंजनियां और पलकों पर फोड़े होना। श्वेतपटल (आंखों का सफेद भाग) पर कम या अधिक जलन होना। श्वेतपटल धब्बों में उभरा हुआ और नीलाभ लाल होना। बड़े-बड़े चपटे छाले होने के साथ आंखों का ठीक से काम न करना। बार-बार होने वाला उपशुक्लमण्डल की जलन। पुराने श्वेतपटल की सूजन। इस तरह के आंखों से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में से कोई भी लक्षण हो तो रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देनी चाहिए।

कान से सम्बंधित लक्षण :- कान की पुरानी सूजन तथा कान से पीब का निकलना। खाने-पीने की चीज निगलते समय कान में कड़कड़ाहट की आवाज सुनाई देना। कान के फोड़े होना आदि कान से सम्बंधित लक्षणों को ठीक करने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण :- पुरानी सर्दी-जुकाम होना तथा नाक से गाढ़े व हरे रंग का बलगम निकलना। बलगम के साथ खून एवं पीब आना। नाक को साफ करते समय दांत में दर्द होना। नथूनों के अन्दर घाव होना। नाक के अन्दर खुश्की होना तथा नाक के जड़ में दर्द व दबाव महसूस होना आदि नाक रोग के लक्षणों से पीड़ित रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देनी चाहिए।

मुंह से सम्बंधित लक्षण :- जीभ के नोक पर तेज दर्द होना। जड़ के पास किनारों पर सफेद फफोले पड़ना तथा जीभ में घाव होने के साथ दर्द होना। मसूढ़ों तक दांतों का खराब हो जाना, दांतों व मसूढ़ों का अत्यन्त स्पर्शकातर (छूने से तेज दर्द होना) तथा मसूढ़ों का पीछे हट जाना। जीभ के नीचे फोड़े होना, जीभ व मुंह के अन्दर की शिरायें फूली हुई। ऐसे मुंह से सम्बंधित लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी होता है।

दांत से सम्बंधित लक्षण :- दांत में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें दांतों के जड़ खोखले हो जाते हैं परन्तु ऊपरी भाग ठीक ही रहता है। दांत पर पीले रंग का मैल जम जाता है और दांत टूटता रहता है। चाय पीने के बाद दांत में दर्द होता है तथा नाक छिड़कने से भी खोखले दांत के अन्दर या किनारे पर दर्द होता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।

सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सांस संस्थान से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को दोपहर के बाद लगातार खांसी आती है और साथ ही पेट के अन्दरूनी भाग में दर्द होता है। बच्चों का दमा रोग। स्वरनली में दानेदार फुंसियां होना तथा आवाज नली में लम्बे समय से चले आ रहे जलन। सांस से सम्बंधित ऐसे लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण:- आमाशय से सम्बंधित विभिन्न लक्षण जैसे- भूख का न लगना। ताजे मांस व आलू खाने की इच्छा न करना। चिकने या तेल वाले पदार्थ खाने के बाद बदबूदार या खट्टी डकारें आना। पाकाशय के ऊपरी भाग में काटता हुए दर्द होना। प्याज खाने की इच्छा न करना। पेट का फूल जाना, खाना खाने से पहले पाकाशय में धंसने जैसा महसूस होना, खाना खाने के बाद पेट में दर्द होना तथा प्यास कम या अधिक लगना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग चाय पीने के कारण अजीर्णता को दूर करने के लिए भी किया जाता है।

पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट का फूल जाना। पेट में खिंचाव महसूस होना। पुराने दस्त रोग का बासी भोजन करने के बाद बढ़ जाना। दस्त का तेजी से आने तथा दस्त करते समय गड़गड़ की आवाज आना। कत्थई रंग के धब्बे बनना। पेट का फूल जाने के साथ पेट का फैल जाना। पेट में गड़गड़ की आवाज के साथ पेट का दर्द आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- कब्ज बनने के कारण मलाशय में तेज दर्द होना तथा दर्द के कारण दस्त करते समय मल का मलद्वार से वापस मलाशय में चले जाना। बैठने पर अधिक वेदना साथ ही मलद्वार के पास सुई के चुभने की तरह दर्द व जलन होना। मलद्वार में घाव होना, मलद्वार पर मस्से का उत्पन्न होना तथा मलद्वार में कीड़े होने जैसा महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। सुबह के समय पतले दस्त का आना या खाना खाने के बाद बिना दर्द या दर्द के साथ दस्त का आना। पीले रंग के पतले दस्त का आना तथा दस्त के समय पहले हवा का निकलना उसके बाद तेजी से मल का आना। पेट में गड़गड़ाहट होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है। बवासीर के मस्सों में सूजन और जलन होने पर उस स्थान को छूने या बैठने से दर्द अधिक होता है। मलद्वार में खुजली होती है। सीवन (लिंग की सुपारी) पर गुमड़ी हो जाती है और उसमें मवाद आ जाती है जिसके कारण चलने-फिरने से दर्द होता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि लेनी चाहिए।

मूत्राशय से सम्बंधित लक्षण :- मूत्रनली का सूज जाना व जलन होना। पेशाब करते समय पेशाब की धार कई भाग में बंटी हुई होने के साथ धार कम होना। पेशाब करने के बाद बूंद-बूंद कर पेशाब का टपकना। पेशाब करने के बाद तेज काटता हुआ दर्द होना। बार-बार पेशाब लगना तथा पेशाब करते समय मूत्राशय में दर्द होना। अचानक पेशाब का इतने तेजी से लग जाना कि उसे कुछ क्षण के लिए भी रोका नहीं जा सकता। मूत्राशय की संकोचक पेशी में चुन्नता आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।

पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- लिंग के अगले भाग की त्वचा व लिंगमुण्ड (लिंग के अगले भाग) में जलन होना तथा लिंग में दर्द होना। लिंग के अगले भाग में जलन होना। प्रमेहजनित आमवात। अण्डकोषों में लम्बे समय से चला आ रहा खिंचाव। मूत्राशय के मुख के पास दर्द और जलन होना तथा पेशाब का बार-बार व तीव्रवेग से आना। पुर:स्थग्रंथि का बढ़ जाना। इस तरह के मूत्राशय से सम्बंधित लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। सूजाक रोग में पहले मवाद पतला आता है और फिर बाद में गाढ़ा पीले रंग का मवाद आने लगता है। मूत्रनली का मुख मवाद के कारण बंद होने लगता है। सुजाक पुराना होने पर पतला चिपचिपा रस निकलता है। सूजाक की बीमारी शुरू होते ही कैनाबिस सैटाइवा के प्रयोग करने से 2 सप्ताह के अन्दर सूजाक रोग ठीक होता है उसके बाद थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से सूजाक रोग पूर्ण रूप से अच्छा हो जाता है।

स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्त्री के योनि और मूलाधार के पास मस्से उत्पन्न होना। अधिक मात्रा में प्रदर-स्राव होना तथा प्रदर गाढ़ा व हरे रंग का आना। बाएं डिम्बाशय और बाएं वंक्षणप्रदेश (इंग्युनियल रिजन) में अत्यधिक तेज दर्द होना। मासिकस्राव देर से आने के साथ स्राव बहुत कम मात्रा में आना। मासिकस्राव के समय डिम्बकोष में जलन होना विशेषकर बाईं डिम्बकोष में। मासिकस्राव से पहले अधिक मात्रा में पसीना आना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- चलते समय रोगी को ऐसा महसूस होता रहता है जैसे उसके शरीर के सभी अंग टूट रहे हैं। अंगुलियों की नोक सूजी हुई, लाल तथा सुन्न पड़ जाना। पेशियों की कमजोरी व कंपन। जोड़ों से कड़कड़ाहट की आवाज आना। एड़ियों व पाश्र्णिकाओं में दर्द होना। नख भंगुर। पैर के नाखूनों में नख का बढ़ना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा अधिक कोमल होना, त्वचा पर फोड़े होना, त्वचा पर गुटिकायें होना, मस्से होना, तथा त्वचा पर जख्म होना विशेष रूप से मलद्वार एवं जननेन्द्रिय पर जख्म होने पर थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। त्वचा पर छाले व चकत्ते होना। त्वचा पर मीठा पसीना आने के साथ तेज बदबू आना। त्वचा का सूख जाना तथा त्वचा पर कत्थई रंग के धब्बे बनना। कमर में दर्द तथा दाद होना। ग्रंथियों में फाड़ता हुआ दर्द होना। ग्रंथि का बढ़ जाना। नख का खराब हो जाना तथा नख का टूट जाना व कोमल होना। आवृत पेशियों में उदभेद उत्पन्न होना जो खुजलाने पर और बढ़ता है। रोगग्रस्त अंगों को छूने से तेज दर्द होना। शरीर के एक भाग में ठण्ड महसूस होना। हाथों व बांहों पर कत्थई रंग के धब्बे होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।

नींद से सम्बंधित लक्षण :- नींद का न आना या नींद का किसी कारण से टूटते रहना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से लाभ होता है।

बुखार से सम्बंधित लक्षण :- बुखार ऐसे लक्षण जिसमें बुखार के समय ठण्ड जांघों से शुरू होकर पूरे शरीर में फैलता है। बुखार में सिर को छोड़कर पूरे शरीर पर पसीना आना। नींद में रोगी के शरीर से तेज खट्टा शहद की गंध की तरह पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।

वृद्धि :-

रात के समय, बिस्तर की गर्मी से, रात के 3 बजे, दोपहर 3 बजे, ठण्डी हवा में, जुकाम के बाद, तेल वाले भोजन करने पर तथा टीका लगाने पर रोग बढ़ता है।

शमन :-

बाईं ओर के किसी अंग को भीतर की ओर खींचने पर रोग में आराम मिलता है।

तुलना :-

थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की तुलना मेडो, सैबा, साइली, कैना-सैटा, कैन्था, कोपे और स्टैफि औषधियों से की जाती है।

मात्रा :-

थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि के मूलार्क या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। कुछ विशेष स्थितियों में जैसे- पूरे शरीर पर मस्से उत्पन्न होने पर मस्से को हटाने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की 1000 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।


थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला THLASPI BURSA PASTORIS-CAPSELLA

 थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला THLASPI BURSA PASTORIS-CAPSELLA

परिचय-

थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि स्त्री रोग से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में तीव्र क्रिया करती है और रोग को समाप्त करती है। यह औषधि विशेष रूप से रक्तस्राव (खून के बहाव) को रोकती है और पेशाब में यूरिक एसिड की मात्रा को नष्ट करती है। इस औषधि का प्रयोग गर्भकाल के समय योनि से सफेद पदार्थ का निकलना तथा लम्बे समय से चले आ रहे स्नायुओं के दर्द को समाप्त करने में किया जाता है। गुर्दे और मूत्राशय की जलन। जरायु-सूत्रार्बुद से खून निकलने के साथ पीठ में कुचलन की तरह दर्द होना। स्कन्धफलको के बीच दर्द होना। गर्भाशय से खून स्राव होने के साथ बांयटे पड़ने तथा खून के थक्के निकलना आदि लक्षणों को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। रोगी में छाछ पीने की तीव्र इच्छा करने तथा दबे हुए जरायु रोगों के कारण हुए हानि आदि को दूर करने के लिए थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग किया जाता है। 

शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का उपयोग :- 

सिर व आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंख और चेहरा सूजा हुआ। बार-बार नाक से खून का आना (नकसीर)। चक्कर आने के साथ सिर दर्द होना। कपाल में दर्द होना जो दोपहर के बाद और तेज हो जाता है। कानों के पीछे पपड़ीदार फोड़े-फुंसियां होना। जीभ सफेद व लेपावृत होना। मुंह और होंठ कटे-फटे होना तथा दाहिनी आंख के ऊपर तेज दर्द होने के कारण आंख में ऊपर की ओर खिंचाव महसूस होना। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग कराना चाहिए। 

नाक से सम्बंधित लक्षण:- नाक का ऑपरेशन करने से यदि नाक से खून आता हो विशेषकर खराब खून आता हो तो ऐसे लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस- कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- चलने या सवारी करने के फलस्वरूप लिंग उत्तेजना के कारण वीर्य का आपने-आप निकल जाना आदि पुरुष रोग के लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि लेनी चाहिए।

स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्त्री रोग से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें स्त्री को रक्तप्रदर (प्रदर के समय योनि से खून आना) आता है तथा बार-बार अधिक मात्रा में मासिकस्राव होता रहता है। मासिकस्राव के समय गर्भाशय में तेज दर्द होता रहता है। एक मासिकस्राव समाप्त होने के बाद जब दूसरा मासिकस्राव शुरू होता है तो मासिकस्राव के शुरुआती अवस्था में अधिक मात्रा में मासिकस्राव आता है। ऐसे स्त्री रोग सम्बंधित लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। मासिकधर्म समय से पहले आना तथा मासिकस्राव के बाद प्रदर-स्राव होना, प्रदरस्राव के समय खून का आना, प्रदरस्राव के साथ काला-काला खून के थक्के आने के साथ स्राव से तेज बदबू आना। गर्भाशय में सख्त ऐंठन सा दर्द होना। उठते समय गर्भाशय में दर्द होना। योनि के पास तेज दर्द होना। बच्चे को जन्म देने के समय गर्भाशय में दर्द होना। कभी-कभी मासिकधर्म समाप्त होते ही पुन: मासिकधर्म शुरू हो जाना। इस तरह के मासिकधर्म सम्बंधी सभी परेशानियों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करने से रोग जल्द ठीक होता है। इसके अतिरिक्त मासिकधर्म के कुछ दिन पहले और बाद को स्याह बदबूदार प्रदरस्राव होना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि कैंसर रोग के दर्द को ठीक करने में भी प्रयोग होता है।

मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- मूत्र सम्बंधी विभिन्न लक्षण जैसे- पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब भारी व फास्फेट मिला हुआ होना। मूत्राशय की पुरानी सूजन। पेशाब करने में परेशानी तथा पेशाब करते समय दर्द के कारण बेहोशी जैसी अवस्था बन जाना आदि मूत्राशय के लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि लेनी चाहिए। पेशाब के साथ खून का आना, मूत्राशय में पथरी बनना, हल्के झटके लगने पर ही पेशाब का अपने आप निकल जाना, गुर्दे में दर्द होना तथा पेशाब के साथ लाल रेत का कण आना आदि लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का सेवन करना चाहिए। मूत्रनली में जलन होना तथा पेशाब करते समय पेशाब की धार कई भागों में बंटी हुई होना आदि ऐसे लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।

वृद्धि :-

मासिकधर्म के समय, गर्भाकाल में गर्भस्त्राव के बाद, प्रसवकाल में उठने पर, चलने तथा सवारी करने से रोग बढ़ता है।

शमन:-

दबाने से, गर्म चीजो के प्रयोग से, गर्म कमरे में जाने से तथा गर्म सेंक से रोग में आराम मिलता है।

तुलना :-

थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि की तुलना , क्राकस, ट्रिलिय या मिलिफो औषधि से की जाती है।

मात्रा :-

थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि के मूलार्क या 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।


थाइमोल THYMOL

 थाइमोल THYMOL

परिचय-

थाइमोल औषधि विशेष रूप से जननेन्द्रियों से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों पर क्रिया करती है और जननेन्द्रियों से सम्बंधित रोग समाप्त करती है। इस औषधि का प्रयोग वीर्यपात, लिंग में उत्तेजना के साथ दर्द होना और पुर:स्थस्रावों में किया जाता है। इस औषधि के प्रयोग से जननेन्द्रिय अधिक प्रभावित होती है जिससे कभी-कभी लैंगिक अवसाद उत्पन्न हो जाते हैं। थाइमोल औषधि अंकुश कीड़े को समाप्त करने में अधिक लाभकारी है। 

शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थाइमोल औषधि का उपयोग :-

मन से सम्बंधित लक्षण : मानसिक असन्तुलन के कारण रोगी व्यक्ति में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते है जैसे- रोगी व्यक्ति अधिक चिड़चिड़ा हो जाता है तथा वह किसी प्रकार के शासन या दबाव को सहन नहीं कर पाता है। वह अपने इच्छा के अनुसार ही काम करना चाहता है और अपनी इच्छा के अनुसार ही जीना चाहता है। रोगी किसी की बातों को नहीं मानता तथा हर समय अपनी मनमानी ही करता रहता है। रोगी व्यक्ति में सोचने व समझने की शक्ति कम हो जाती है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी को पीठ में थकान महसूस होती है और पूरे कमर में दर्द होता है तो रोगी को थाइमोल औषधि लेनी चाहिए। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को कोई भी काम शारीरिक या मानसिक करने में परेशानी होती है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।

नींद से सम्बंधित लक्षण :- सुबह सोकर उठने पर थकान महसूस होना। रात के समय कामोत्तेजक सपने देखने के कारण ठीक से नींद न आना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि का सेवन करना चाहिए।

पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- रात के समय अधिक मात्रा में वीर्यपात होना और साथ ही उत्तेजना वाले सपने आना जिसके कारण अपने आप लिंग उत्तेजित हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि लेनी चाहिए। मूत्रनली में जलन होना तथा बूंद-बूंद करके पेशाब का टपकना। बार-बार पेशाब का आना। यूरेट्स बढ़े हुए तथा फौस्फेट्स कम निकलना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।

वृद्धि :-

मानसिक और शारीरिक काम करने से रोग बढ़ता है।

मात्रा :-

थाइमोल औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।


टुबरकुलीनम TUBERCULINUM

 टुबरकुलीनम TUBERCULINUM

परिचय-

टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से गुर्दे से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग गुर्दे सम्बंधी लक्षणों में सावधानी से करना चाहिए क्योंकि जहां त्वचा और आंतें ठीक से काम नहीं करती हैं वहां इस औषधि की उच्च शक्ति हानि पहुंचाती है। यह औषधि पुराने मूत्राशय की सूजन को ठीक करती है। यह औषधि क्षय (टी.बी.) रोग के विभिन्न लक्षणों मे अत्यंत लाभकारी होता है विशेष रूप से हल्के घाव तथा संकीर्ण छाती वाले रोगियों के लिए। शिथिल तन्तुओं के दुबारा ठीक होने के कारण शारीरिक शक्ति का क्षीण होना और जलवायु में होने वाले परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशीलता अर्थात हल्का सा मौसम परिवर्तन होने पर रोग हो जाता है। रोगी को हमेशा थकान महसूस होना, गति करने से भारी थकान उत्पन्न होना, कामकाज करने का मन न करना तथा रोगी को हमेशा कुछ नया करने की चाहत। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जो निरंतर बदलता रहता है तथा हवा के हल्के बहाव से ठण्ड लगने लगती है तो ऐसे लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।

मिर्गी का दौरा, स्नायविक अवसन्नता तथा स्नायविक बच्चों के लिए यह औषधि बहुमूल्य है। बच्चों में कई सप्ताहों तक गतिशील रहने वाला अतिसार, अत्यधिक कमजोरी, शरीर का नीला पड़ जाना, मानसिक रूप से कमजोर बच्चे, बढ़ी हुई गलतुण्डिकायें, त्वचा के रोग, जोड़ों का तेज दर्द, अधिक संवेदनशील, शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर होना, सर्वांगीण अवसन्नता, स्नायविक कमजोरी, कंपन तथा जोड़ों की सूजन आदि में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।


शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टुबरकुलीनम औषधि का उपयोग :-

मन से सम्बंधित लक्षण :- टुबरकुलीनम औषधि में मन से सम्बंधित लक्षण मौजूद होते हैं जिसके कारण यह मन से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करती है। यह औषधि रोगी में पागलपन का दौरा पड़ने, विषाद, नींद का न आना आदि को दूर करती है। नींद के ऐसे लक्षण जिसमें रोगी बेहोश व्यक्ति की तरह सोता रहता है। रोगी में अधिक चिड़चिड़ापन उत्पन्न होना तथा छोटी-छोटी बातों में गुस्सा हो जाना, विशेषकर सोकर उठने पर। व्यक्ति में हताशा या निराशा उत्पन्न होना। रोगी व्यक्ति हमेशा कुत्ते से डरता रहता है। स्वभाव बदलने लगता है तथा अपशब्द का अधिक प्रयोग करता है तथा रोगी में दूसरे को कोसने तथा कसम खाने की स्वभाविक प्रवृति आ जाती है। इस तरह के मानसिक लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

सिर से सम्बंधित लक्षण :- मस्तिष्क की गहराई में दर्द और स्नायुशुल होना। रोगी को अजीब-अजीब दिखाई देना। सिर में तेज दर्द होना जैसे कोई पट्टी सिर के चारों ओर बंधी हो। मस्तिष्क को ढकने वाली झिल्ली में जलन होना। शरीर से पानी की हानि होना विशेषकर पसीना और पेशाब के द्वारा। दस्त का लगना, रिसावदार उद्भेद आदि लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देनी चाहिए। रात के समय नींद में डरावने सपने आना व भ्रम उत्पन्न होना जिसके कारण रोगी अचानक नींद से जाग उठना। जीवाणुओं के कारण बालों को आपस में चिपक जाना। छोटे-छोटे फोड़ों के गुच्छे उत्पन्न होना, अधिक दर्द होना तथा नाक में फोड़े हो जाना। नाक से बदबूदार पीब का आना आदि। इस तरह के नाक से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।

कान से सम्बंधित लक्षण :- कान से लगातार पीब का निकलते रहना तथा पीब से बदबू आना। कान के पटल में छेद होने की तरह टेढ़े-मेढ़े किनारे रहना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी मांस खाने की इच्छा नहीं करता है और मांस खाते ही जी मिचलाने व उल्टी होने लगता है तो ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। भोजन करने के बाद पेट में खालीपन महसूस होना तथा भूख लगने जैसा महसूस होना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है। ठण्डा दूध पीने की इच्छा होने पर यह औषधि देने से लाभ होता है।

पेट से सम्बंधित लक्षण :- सुबह के समय अचानक दस्त का लगना। मल गाढ़े कत्थई रंग के आने के साथ मल से तेज बदबू आना। आन्त्रयोजन यक्ष्मा (टी.बी.) आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।

स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्तनों के फोड़े। मासिकस्राव नियमित समय से बहुत पहले तथा अधिक मात्रा में कष्ट के साथ आना। मासिकस्राव अधिक मात्रा में आने के साथ अधिक दर्द होना। इस तरह के स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- गलतुण्डिकाएं का बढ़ जाना। रात को नींद में कठोर तथा सूखी खांसी आना। खांसी के साथ गाढ़ा बलगम आना तथा वायुनलियों से अधिक मात्रा में स्राव होना। दम फुलना। गले में घुटन महसूस होना तथा ताजी हवा आने पर घुटन महसूस होते रहना। ठण्डी हवा की अधिक इच्छा करना। बच्चों में सांस नली में सूजन होना। दौरे के रूप से प्रकट होने वाली कठोर खांसी, अधिक पसीना आना तथा शारीरिक वजन कम होना। पूरे छाती से कर्कश ध्वनि निकलना। गुटिकासंचय फुस्फुसशिखर में आरम्भ होता है। इस तरह के सांस से सम्बंधित लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। ध्यान रखें कि इस औषधि का प्रयोग बार-बार करना हानिकारक होता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण :- गर्दन की पीछे की हड्डियों में और नीचे रीढ़ की हड्डी में तनाव महसूस होना तथा कन्धों के बीच या पीठ के ऊपरी भाग में ठण्ड लगना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

त्वचा से सम्बंधित लक्षण:- त्वचा पर उत्पन्न पुराना दाद तथा त्वचा पर उत्पन्न ऐसी तेज खुजली जो रात को और तेज हो जाता है। क्षय (टी.बी.) रोग से ग्रस्त बच्चों के चेहरे पर मुंहासे होना। विचर्चिका आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

नींद से सम्बंधित लक्षण:- मानसिक परेशानी या अन्य कारणों से नींद का ठीक से न आना तथा रात को देर से सोना व सुबह जल्द उठना आदि कारणों से नींद का पूरा न होना जिसके कारण दिन में सिर या बदन में तेज दर्द होना। रात को नींद में धुंधला, बेचैन व डरावने सपने आना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देनी चाहिए।

बुखार से सम्बंधित लक्षण :- धीरे-धीरे आने वाला बुखार तथा पूर्ण रूप से बुखार उत्पन्न होने के बाद लगातार बना रहता है। ऐसे लक्षण वाले बुखार में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग हर दूसरे घंटे बाद करना चाहिए। शरीर से अधिक पसीना आना तथा अधिक ठण्ड महसूस होना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

वृद्धि :-

गति करने से, संगीत से, आंधी के पहले, खड़े रहने पर, ठण्डी हवा के झोंके से, सुबह के समय और नींद में रोग बढ़ता है।

शमन :-

खुली हवा में घूमने या रहने से रोग में आराम मिलता है।

तुलना :-

टुबरकुलीनम औषधि की तुलना कल्के-का, काली-स, सोरि, पल्स, सीपि और सल्फ औषधि से की जाती है।

पूरक :-

कल्के, चायना तथा ब्रायो औषधि टुबरकुलीनम औषधि के पूरके है।

मात्रा :-

टुबरकुलीनम औषधि की 30 से उच्च शक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग किसी रोग में करने के बाद दुबारा प्रयोग करते समय लम्बे समय का अन्तर दें। बच्चों के रोग में इस औषधि के बीच वाली शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।