होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है

होम्योपैथी एक विज्ञान का कला चिकित्सा पद्धति है। होम्योपैथिक दवाइयाँ किसी भी स्थिति या बीमारी के इलाज के लिए प्रभावी हैं; बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों में होमियोपैथी को प्लेसीबो से अधिक प्रभावी पाया गया है। होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है।

भारत होम्योपैथिक चिकित्सा में वर्ल्ड लीडर हैं।

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत 1796 में सैमुअल हैनीमैन द्वारा जर्मनी से हुई। आज यह अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी में काफी मशहूर है, लेकिन भारत इसमें वर्ल्ड लीडर बना हुआ है। यहां होम्योपथी डॉक्टर की संख्या ज्यादा है तो होम्योपथी पर भरोसा करने वाले लोग भी ज्यादा हैं।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है। होम्योपैथी में किसी भी रोग के उपचार के बाद भी यदि मरीज ठीक नहीं होता है तो इसकी वजह रोग का मुख्य कारण सामने न आना भी हो सकता है।

होम्योपथी दवा मीठी गोली में भिगोकर देते हैं

होम्योपथी हमेशा से ही मिनिमम डोज के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोशिश की जाती है कि दवा कम से कम दी जाए। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर दवा को मीठी गोली में भिगोकर देते हैं क्योंकि सीधे लिक्विड देने पर मुंह में इसकी मात्रा ज्यादा भी चली जाती है। इससे सही इलाज में रुकावट पड़ती है।

डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं।

होम्योपैथी की सबसे खास बात है कि आप डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं। इससे किसी भी तरह का कोई साइड इफेक्ट होने का खतरा नहीं होता।

क्रोमिकम एसिडम CHROMICUM ACIDUM

 क्रोमिकम एसिडम CHROMICUM ACIDUM

परिचय-

डिफ्थीरिया, नाक के पीछे के हिस्से में रसौली और जीभ के ऊपर कलाबुर्द (एपीथेलियोमा) आदि के लक्षणों में क्रोमिकम एसिडम बहुत ज्यादा लाभकारी साबित होती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्रोमिकम एसिडम औषधि का इस्तेमाल-

नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक के अंदर जख्म होना, बदबू वाला स्राव आना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि देने से लाभ होता है।

कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - डिफ्थीरिया, गले में जलन होना, बलगम आना आदि गले के रोगों में रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।

शरीर से सम्बंधित बाहरी लक्षण - शरीर के सारे अंगों में बैचेनी होना, स्कंध-फलकों और गर्दन में दर्द, पैरों और घुटनों में दर्द होना आदि लक्षणों में क्रोमिकम एसिडम औषधि का सेवन करने से आराम आता है।

मल से सम्बंधित लक्षण - रोगी को बार-बार पतले दस्त होना, दस्तों के साथ जी का मिचलाना और चक्कर आना, बवासीर, कमर के नीचे के हिस्से में कमजोरी आना आदि लक्षणों में रोगी को अगर नियमित रूप से क्रोमिकम एसिडम औषधि सेवन कराई जाए तो उसके लिए लाभकारी होता है।

तुलना-

क्रोमिकम एसिडम औषधि की तुलना कालीबाई, रस, क्रोमियम सल्फेट आदि से की जाती है।

मात्रा-

रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देने से उसका रोग ठीक हो जाता है।


कोपेवा Copaiva

 कोपेवा Copaiva

परिचय-

कोपेवा औषधि की साधारणत: पेशाब करने का यंत्र, पेशाब करने की नली, सांस लेने के यंत्र की श्लैष्मिक झिल्ली के यंत्र की श्लैष्मिक झिल्ली के ऊपर खास क्रिया होती है। पेशाब करने के यंत्र और पेशाब करने की नली में इसकी क्रिया होने के कारण ही रोगी के शरीर में सूजाक रोग की जलन के लक्षण पैदा हो जाते हैं, इसीलिए प्रमेह रोग की शुरुआती अवस्था में जब पेशाब करते समय जलन हो, बार-बार पेशाब आए, पेशाब बूंद-बूंद करके दर्द के साथ आए, पेशाब के साथ सफेद रंग का पतला मवाद के आने जैसे लक्षण नज़र आए तब ये जलन धीरे-धीरे पेशाब करने की नली तक जाकर पेशाब के साथ गोंद के जैसा लेसदार श्लैष्मा और खून निकलता है और पेशाब गंदा नज़र आता है, इस समय भी अगर कोपेवा औषधि का प्रयोग नियमित रूप से किया जाए तो लाभकारी होता है। 

विभिन्न रोगों के लक्षणों में कोपेवा औषधि का उपयोग-

सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, माथे के ऊपर हल्का-हल्का सा दर्द जो के सिर के पीछे के हिस्से में फैलकर फिर दुबारा माथे पर आ जाता है इसके साथ ही सिर में जलन भी हो जाती है, ज्यादा तेज आवाज होते ही रोगी के सिर में दर्द शुरू हो जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक से बहुत ज्यादा गाढ़ा, बदबूदार बलगम सा निकलना जो रात को सोते समय गले के अंदर तक चला जाता है, नाक में जलन और खुश्की, नाक की हडि्डयों पर पपड़ी सी जम जाना आदि लक्षणों में कोपेवा औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण - भोजन करते समय भोजन का स्वाद ऐसा लगना जैसे कि उसमें बहुत ज्यादा नमक भरा हो, मासिकधर्म के दौरान या शीतपित्त निकलने के बाद पेट में बहुत से रोग होना, आंतों में हवा भर जाना, बार-बार मलत्याग के लिए जाना, मलक्रिया के समय बहुत ज्यादा परेशानी होना और दर्द होना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों मे रोगी को कोपेवा औषधि देने से आराम मिलता है।

मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का जलन के साथ और जोर लगाकर आना, पेशाब एक बार में न आकर बूंद-बूंद के रूप में आना, पेशाब रुक जाने के कारण मसाने में, मलान्त्र में और मलद्वार में दर्द होना, पेशाब करने की नली के मुंह पर सूजन आ जाना, पेशाब का रंग हरा गंदा सा होना आदि लक्षणों के आधार पर अगर नियमित रूप से कोपेवा औषधि का प्रयोग किया जाए तो मूत्ररोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।

मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - मल के साथ आंव का आना, पेट में दर्द होना, मलद्वार में बवासीर का रोग होने के कारण खुजली और जलन होना आदि लक्षणों में कोपेवा औषधि रोगी को खिलाने से लाभ होता है।

पुरुष से सम्बंधित लक्षण - रोगी के अंडकोषों में सूजन आना और उनका मुलायम होना आदि लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ मिलता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के योनि और मलद्वार में खुजली होने के साथ पीब के साथ खून आना, मासिकधर्म में स्राव ज्यादा और बदबू के साथ आना, इसके साथ ही चारों ओर भ्रमण करने वाला दर्द जो कूल्हों की हडि्डयों तक फैल जाता है, जी का मिचलाना आदि लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।

सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी को खांसी के साथ बहुत ज्यादा मात्रा में मिट्टी के रंग का पीब जैसा बलबम आना, सांस की नलियों का नजला होना जिसके साथ हरे रंग का बदबूदार स्राव निकलता रहता है, आवाज की नली, सांस की नलियों आदि में खराबी होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।

चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर गुलाबी से रंग के छोटे-छोटे दाने निकलना, त्वचा पर जलन होना खासकर पेट के आसपास की त्वचा में, शीतपित्त के साथ बुखार और कब्ज होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।

तुलना -

सैंटालम, कैनाबिस, कैथ, बैरोस्मा, क्यूबेबा, एपिस, वेस्पा, इरिजरोन, सेनेशियों, सीपिया से कोपेवा की तुलना की जाती है।

प्रतिविष -

बेला, मर्क्यू।

मात्रा-

कोपेवा औषधि की पहली से तीसरी शक्ति तक रोगी को देने पर अगर रोगी को लाभ न पहुंचे तो इस शक्ति को बढ़ाकर पहली से छठी शक्ति तक भी कर सकते हैं। 


साइमेक्स लेक्टुलैरिअस Cimex Lectularius

 साइमेक्स लेक्टुलैरिअस Cimex Lectularius

परिचय-

किसी व्यक्ति को बुखार या पारी से आने वाले बुखार जिसमें रोगी को पूरे दिन थकान सी रहती है, हर समय नींद सी आती रहती है, रोगी को पैर पूरे फैलाने में परेशानी होती है और उसे पैरों को मोड़कर ही सोना पड़ता है जैसे लक्षणों के आधार पर साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि बहुत अच्छी मानी जाती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि का उपयोग-

बुखार से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को अचानक पूरे शरीर में ठण्ड के साथ कंपकपी आना, बुखार के बढ़ने के साथ प्यास का कम होना, गले में इस तरह का दर्द होना जैसे कि किसी ने गला दबा रखा हो, पानी पीने से गले में दर्द होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराना लाभकारी होता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत ज्यादा तेजी से होने वाला दर्द, ज्यादा गुस्सा आना, शीतावस्था की शुरुआत में उत्तेजना होना, माथे की दाईं हड्डी के नीचे दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि बहुत अच्छा असर करती है।

कब्ज से सम्बंधित लक्षण -

गला सूखना जैसे कि बहुत समय से पानी न मिला हो, मलक्रिया करते समय परेशानी होना, मल का सख्त गुठलियों के रूप में आना, मलद्वार में जख्म होना, स्त्रियों की योनि में बाएं डिम्ब तक बहुत तेज दर्द होना आदि कब्ज रोग के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि देने से लाभ होता है।

तुलना-

साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि की तुलना ऐमाने म्यूर, कास्टि, एपिस, युपेट पर्फो से की जा सकती है।

मात्रा-

3x शक्ति से 200 शक्ति तक।


सिक्यूटा विरोसा Cicuta Virosa

 सिक्यूटा विरोसा Cicuta Virosa

परिचय-

सिक्यूटा विरोसा शरीर में किसी भी प्रकार की ऐंठन को दूर करने के लिए बहुत ही लाभदायक औषधि मानी जाती है जैसे किसी व्यक्ति को मिर्गी, हिस्टीरिया, अजीर्णता, दांत निकलते समय रोग के कारण ऐंठन आने में लाभदायक होता है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिक्यूटा विरोसा का उपयोग-

मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी अजीब-अजीब सी हरकते करता है जैसे कभी हंसता है, कभी रोता है, अपने आप ही नाचने, गाने लगता है, खुली आंखों से सपने देखने लगता है, हर किसी को देखकर डरने लगता है, छोटी-छोटी बातों पर सबसे लड़ने लगना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना चाहिए।

सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के रोग के लक्षण जैसे सिर का एक ही तरफ झुक जाना, गर्दन में बुरी तरह दर्द करने वाला बुखार, गर्दन की पेशियों में खिंचाव आना, चक्कर आने के साथ ही पेट में दर्द और पेशियों में ऐंठन आना, किसी चीज को लगातार घूरते ही रहना, दिमाग पर नज़र न आने वाली चोट लगने से रोगी को लकवा मार जाना आदि लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि खिलाने से आराम पड़ता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण - किसी भी अखबार या किताब को पढ़ते समय उसके अक्षर साफ-साफ नज़र न आना, आंखों की पुतलियों का फैल जाना, आंखों से एक ही चीज का 2-2 दिखाई देना, आंखों का पथरा जाना, सामने रखी हुई चीज का एकदम से नज़र न आना आदि लक्षण अगर किसी रोगी में हो तो उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि देनी चाहिए।

चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे पर बहुत छोटे-छोटे लेकिन काफी सारी फुंसिया और दाने निकलना और कुछ दिनों के बाद उनके ऊपर मोटी, पीली सी पपड़ी जम जाना, चेहरा का बिल्कुल लाल होना, जबड़े का अटक जाना, हर समय दान्तों को चबाते रहना आदि लक्षणों के किसी भी व्यक्ति में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि देने से आराम पड़ता है।

कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - गले का बिल्कुल सूख सा जाना, किसी भी खाने या पीने की चीज को निगलते समय परेशानी होना, आहारनली में हड्डी अटक जाने के कारण होने वाले रोगों के लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी को बहुत तेज प्यास लगना, आमाशय में जलन होने के साथ दबाव पड़ना, बार-बार हिचकी आना, पेट में जलन होना, मन का ऐसा करना जैसे कि कोयले आदि चीजे खा लें, भूख कम लगने के साथ बेहोशी छाना और मुंह में झाग आना आदि लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।

पेट से सम्बंधित लक्षण - बैचेनी और चिड़चिड़ेपन के साथ अफारा होना, पेट में गड़गड़ाहट होना, पेट का फूलना और बहुत तेज दर्द होना, पेट में दर्द के साथ लकवा मार जाना आदि लक्षणों के किसी रोगी में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना चाहिए।

मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - सुबह के समय पतले से दस्त आना, बार-बार पेशाब आना, मलान्त्र में बहुत ज्यादा खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।

सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस लेने में परेशानी होना, छाती का कसा हुआ सा महसूस होना, दिल की पेशियों में ऐंठन आना, छाती में गर्मी सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि देने से लाभ मिलता है।

शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - गर्दन की पेशियों में खिंचाव आना और ऐंठन सी महसूस होना, सिर में पीछे की ओर खिंचाव सा होना, पीठ का पीछे की ओर झुक जाना, शरीर के किसी भी अंग को मोड़ने में दर्द होना, मासिकधर्म के दौरान पुच्छास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) में बहुत तेज दर्द सा महसूस होना आदि लक्षणों में अगर रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि नियमित रूप से सेवन कराई जाए तो काफी लाभकारी होती है।

चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर पीले रंग की बहुत सारी फुंसियां निकलना, त्वचा के ऊपर बिना खुजली के होने वाली छाजन, जिसमे स्राव सूखकर सख्त सा हो जाता है और उसका रंग नींबू के छिलके जैसा पीला हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर सिक्यूटा विरोसा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।

वृद्धि-

किसी के द्वारा छूने से, हवा लगने से, चोट लग जाने से, तंबाकू का सेवन करने से रोग बढ़ जाता है

शमन-

गर्मी से रोग कम हो जाता है।

प्रतिविष-

ओपियम, आर्निका।

तुलना -

सिक्यूटा विरोसा औषधि की तुलना सिक्यूटा मैक्यूलेटा, हाइड्रोस्यानिक एसिड, कोनियम, ईनैन्थिस, स्ट्रिकनिया, बेला से कर सकते हैं।

मात्रा -

सिक्यूटा विरोसा औषधि की 6 से लेकर 200 शक्ति तक रोगी को देने से लाभ होता है।


क्राइसैरोबिनम Chrysarobinum

 क्राइसैरोबिनम Chrysarobinum

परिचय-

त्वचा पर किसी तरह के दाग-धब्बे होना, पैरों के दाद, मुहांसों आदि चर्म रोगों में क्राइसैरोबिनम औषधि बहुत ज्यादा लाभकारी होती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्राइसैरोबिनम औषधि का उपयोग-

आंखों से सम्बंधित लक्षण - तेज रोशनी में आते ही आंखों का बंद हो जाना, पलकों में सूजन आना, आंखों से गीढ़ आना, नज़र कमजोर हो जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्राइसैरोबिनम औषधि देने से तुरन्त लाभ होता है।

कान से सम्बंधित लक्षण - कान के पीछे के हिस्से में दर्द होना, कान के अंदर मैल जमा होना, कम सुनाई देना आदि कान के रोग के लक्षण पता चलते ही रोगी को क्राइसैरोबिनम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

तुलना -

क्राइसैरोबिनम में क्राइसोफैन मिला हुआ होता है, जो बहुत तेजी से ऑक्सीजनीकृत होकर क्राइसोफैनिक एसिड में बदल जाता है। ये रुबार्ब और सेन्ना में भी पाया जाता है।

मात्रा-

क्राइसैरोबिनम औषधि रोगी को खिलाने के लिए तीसरी शक्ति से छठी शक्ति तक प्रयोग की जाती है।

जानकारी-

क्राइसैरोबिनम औषधि का प्रयोग बाहरी प्रयोग के लिए लगभग 0.26 से 0.52 ग्राम तक लगभग 28 मिलीलीटर वैसलीन में मिलाकर किया जाता है।

सावधानी-

क्राइसैरोबिनम औषधि का बाहरीय प्रयोग करते समय सावधानी बरतना जरूरी है क्योंकि ये त्वचा में जलन पैदा करती है।


सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा (एक्टिया रेसमोसा) Cimicifuga Racemosa, Actaea Racemosa

 सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा (एक्टिया रेसमोसा) Cimicifuga Racemosa, Actaea Racemosa

परिचय-

सिमिसिफ्यूगा औषधि स्त्री रोगों के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। मासिकधर्म आने पर स्त्रियों को कई तरह की परेशानी होती है उनमे ये औषधि उनके दर्दों को कम करती है। इसके अलावा हिस्टीरिया रोग में, गैस के कारण हाथ-पैरों का सुन्न हो जाना आदि लक्षणों के नज़र आने पर भी ये औषधि बहुत लाभकारी साबित होती है। लेकिन सिर्फ शारीरिक लक्षणों के आधार पर ही सिमिसिफ्यूगा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का उपयोग-

मन से सम्बंधित लक्षण- दिमाग में ऐसा लगना कि जैसे किसी ने बहुत ही भारी काम दे रखा हो सोचने वाला, गाड़ी में घूमने पर डर लगना, अपने आप से ही बाते करना, अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना आदि मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में अजीब सा दर्द होना, अलग-अलग तरह के विचार आना, अजीब-अजीब सी आवाजें आना, जरा सा शोर होते ही सिर दर्द होना आदि लक्षण नज़र आते ही रोगी को तुरन्त सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम आता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की रोशनी कम होने के साथ गोणिका रोग (पेल्वीक ट्रौबल्स), आंखों में जलन होना, आंख से लेकर सिर तक दर्द आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से तुरन्त ही आराम आ जाता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण - गले पर किसी तरह का जोर पड़ने के कारण जी ऐसा होना जैसे कि उल्टी होने वाली हो, किसी चीज ने काटा हो इस प्रकार का दर्द आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म का समय पर न आना, डिम्ब प्रदेश में दर्द जो जांघों के आगे के हिस्से पर ऊपर-नीचे की ओर होता रहता है, मासिकधर्म आने से पहले दर्द होना, मासिकस्राव ज्यादा मात्रा में, गाढ़ा, बदबू के साथ आना, कमर में दर्द होना, स्तनों के नीचे दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

जिन स्त्रियों के अंदर वात धातु के कारण हिस्टीरिया रोग होता है उन्हें कई प्रकार के मासिकधर्म के रोग भी घेर लेते हैं, ऐसी स्त्रियों का मासिकधर्म के दौरान स्राव या तो बहुत कम आता है या कभी बहुत ज्यादा मात्रा में आता है, कभी-कभी तो ये स्राव बिल्कुल ही नहीं आता है। कई मामलों मे स्त्रियों का मासिकधर्म आने से पहले बहुत ज्यादा दर्द होता है लेकिन जैसे ही मासिकधर्म आता है यह दर्द कम होने लगता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर स्त्री को नियमित रूप से सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो कुछ ही समय में उसके ये लक्षण नज़र आना बंद हो जाते हैं।

गर्भावस्था की बहुत सारी परेशानियां जैसे उल्टी आने का मन करना, सिर में दर्द होना, गैस बनने के कारण दर्द होना आदि में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि बहुत ही चमत्कारिक तरीके से काम करती है। हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त लड़की जब गर्भवती होती है तो उस समय हिस्टीरिया रोग के कारण स्त्री को बहुत सारी परेशानियां घेर लेती है। बहुत से लोगों का मानना है कि गर्भवती स्त्री को बच्चे के जन्म से करीब 15-20 दिन पहले अगर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराया जाए तो उसको बच्चे के जन्म के समय किसी तरह की परेशानी नहीं होती और बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है, लेकिन यह किसी-किसी मामले में ही होता है क्योंकि हर गर्भवती स्त्री की प्रकृति एक ही तरह की नहीं होती, सभी के ल़क्षण अलग-अलग प्रकार के होते हैं और जब तक हर स्त्री के सारे लक्षण न मिले तो सिर्फ रोग या रोग के नाम पर 1 या 2 लक्षणों के आधार पर ही इस औषधि का इस्तेमाल करना सही नहीं कहा जा सकता, इसलिए इसे इतना लाभकारी नहीं कह सकते।

गर्भवती स्त्री के बच्चे के जन्म लेने के दर्द के शुरू होते ही (लेबर पैन) कंपकपी होना महसूस होना, हिस्टीरिया के लक्षण नज़र आते ही, बच्चे के जन्म लेने के दर्द के रुकते ही, गर्भाशय का मुंह न खुलना आदि लक्षण प्रकट होते ही उसे सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।

मासिकधर्म के दौरान स्त्रियों की स्नायुमण्डली (नर्वस सिस्टम) कमजोर हो जाती है इस हालत में अगर स्त्री को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि सब ऐन्टिसोरिक औषधियों का असर बहुत ही गम्भीर और चिरस्थाई होता है और अगर वो समलक्ष्ण विशिष्ट और उच्चशक्ति संपन्न हो तो बहुत ही प्रबल क्रिया के साथ रोग बढ़ सकता है। इसलिए एक बहुत ही महान व्यक्ति न पहले नक्सवोमिका का इस्तेमाल करके औषधि की शक्ति सहिश्णुता प्राप्त कर लेने के उपदेश दिये है, अगर ऐसा न किया जाए तो इस औषधि से पूरी तरह लाभ प्राप्त नहीं होगा। मासिकधर्म के दिनों में अगर स्त्री को कोई भयानक रोग घेर लेता है तो उसे ज्यादा ताकत वाली औषधियों का बार-बार सेवन नहीं करना चाहिए। इस हालत में स्त्री को नक्सवोमिका की एक खुराक देकर लक्षणों के आधार पर ही कुछ घंटों के बाद दूसरी औषधि दे देनी चाहिए।

सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी के गले में ऐसे लगना जैसे कि कुछ अटक रहा हो, सांस का रुक-रुककर चलना, सूखी खांसी होना जो रात को सोते समय ज्यादा चलती है आदि सांस के रोग के लक्षणो में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।

हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- नाड़ी का धीरे-धीरे चलना, बाजू सुन्न होना, ऐसा महसूस होना कि दिल की धड़कन बंद हो रही हो और दम सा घुट रहा है, बाएं स्तन के नीचे के हिस्से में दर्द होना आदि दिल के रोग के लक्षण प्रकट होने पर रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से कुछ ही समय में लाभ हो जाता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण- रीढ़ की हड्डी के ऊपर के हिस्से में छूने पर दर्द होना, गर्दन और कमर में खिंचाव सा आना, पसलियों के बीच के हिस्से में गठिया होना, कमर की पेशियों का ऐंठना आदि पीठ के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।

शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों में धीरे-धीरे बढ़ने वाला दर्द होना, शरीर में बैचेनी सी महसूस होना, पेट की पेशियों में गठिया होना, जनेन्द्रियों में खिंचाव के साथ हल्का-हल्का दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम पड़ जाता है।

वृद्धि-

सुबह के समय, सर्दी से, मासिकधर्म के दौरान, मासिकस्राव जितना ज्यादा होगा दर्द भी उतना ही ज्यादा होगा आदि मे रोग बढ़ जाता है।

शमन- 

गरमाई से, खाना खाने से रोग कम हो जाता है।

तुलना-

सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की तुलना रैमनस कैलिफोर्निका (रैम्नुस कैलीफोरनिका) डेरिस पिन्नाटा (डेरीस पिंनटा), आरिस्टोलोचिया मिलहोमेन्स (ऐरीस्टोलीकिक मील्गोमेंस) कौलोफाइलम, पल्सा, एगारिकस, मैकरोटिन आदि से की जाती है।

मात्रा -

सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की पहली से तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।