होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है

होम्योपैथी एक विज्ञान का कला चिकित्सा पद्धति है। होम्योपैथिक दवाइयाँ किसी भी स्थिति या बीमारी के इलाज के लिए प्रभावी हैं; बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों में होमियोपैथी को प्लेसीबो से अधिक प्रभावी पाया गया है। होम्‍योपैथी चिकित्‍सा के जन्‍मदाता सैमुएल हैनीमेन है।

भारत होम्योपैथिक चिकित्सा में वर्ल्ड लीडर हैं।

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत 1796 में सैमुअल हैनीमैन द्वारा जर्मनी से हुई। आज यह अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी में काफी मशहूर है, लेकिन भारत इसमें वर्ल्ड लीडर बना हुआ है। यहां होम्योपथी डॉक्टर की संख्या ज्यादा है तो होम्योपथी पर भरोसा करने वाले लोग भी ज्यादा हैं।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है।

होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है। होम्योपैथी में किसी भी रोग के उपचार के बाद भी यदि मरीज ठीक नहीं होता है तो इसकी वजह रोग का मुख्य कारण सामने न आना भी हो सकता है।

होम्योपथी दवा मीठी गोली में भिगोकर देते हैं

होम्योपथी हमेशा से ही मिनिमम डोज के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोशिश की जाती है कि दवा कम से कम दी जाए। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर दवा को मीठी गोली में भिगोकर देते हैं क्योंकि सीधे लिक्विड देने पर मुंह में इसकी मात्रा ज्यादा भी चली जाती है। इससे सही इलाज में रुकावट पड़ती है।

डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं।

होम्योपैथी की सबसे खास बात है कि आप डॉक्टरी परामर्श से इसका सेवन किसी भी दूसरे मेडिसिन के साथ कर सकते हैं। इससे किसी भी तरह का कोई साइड इफेक्ट होने का खतरा नहीं होता।

सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा (एक्टिया रेसमोसा) Cimicifuga Racemosa, Actaea Racemosa

 सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा (एक्टिया रेसमोसा) Cimicifuga Racemosa, Actaea Racemosa

परिचय-

सिमिसिफ्यूगा औषधि स्त्री रोगों के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। मासिकधर्म आने पर स्त्रियों को कई तरह की परेशानी होती है उनमे ये औषधि उनके दर्दों को कम करती है। इसके अलावा हिस्टीरिया रोग में, गैस के कारण हाथ-पैरों का सुन्न हो जाना आदि लक्षणों के नज़र आने पर भी ये औषधि बहुत लाभकारी साबित होती है। लेकिन सिर्फ शारीरिक लक्षणों के आधार पर ही सिमिसिफ्यूगा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का उपयोग-

मन से सम्बंधित लक्षण- दिमाग में ऐसा लगना कि जैसे किसी ने बहुत ही भारी काम दे रखा हो सोचने वाला, गाड़ी में घूमने पर डर लगना, अपने आप से ही बाते करना, अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना आदि मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में अजीब सा दर्द होना, अलग-अलग तरह के विचार आना, अजीब-अजीब सी आवाजें आना, जरा सा शोर होते ही सिर दर्द होना आदि लक्षण नज़र आते ही रोगी को तुरन्त सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम आता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की रोशनी कम होने के साथ गोणिका रोग (पेल्वीक ट्रौबल्स), आंखों में जलन होना, आंख से लेकर सिर तक दर्द आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से तुरन्त ही आराम आ जाता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण - गले पर किसी तरह का जोर पड़ने के कारण जी ऐसा होना जैसे कि उल्टी होने वाली हो, किसी चीज ने काटा हो इस प्रकार का दर्द आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म का समय पर न आना, डिम्ब प्रदेश में दर्द जो जांघों के आगे के हिस्से पर ऊपर-नीचे की ओर होता रहता है, मासिकधर्म आने से पहले दर्द होना, मासिकस्राव ज्यादा मात्रा में, गाढ़ा, बदबू के साथ आना, कमर में दर्द होना, स्तनों के नीचे दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

जिन स्त्रियों के अंदर वात धातु के कारण हिस्टीरिया रोग होता है उन्हें कई प्रकार के मासिकधर्म के रोग भी घेर लेते हैं, ऐसी स्त्रियों का मासिकधर्म के दौरान स्राव या तो बहुत कम आता है या कभी बहुत ज्यादा मात्रा में आता है, कभी-कभी तो ये स्राव बिल्कुल ही नहीं आता है। कई मामलों मे स्त्रियों का मासिकधर्म आने से पहले बहुत ज्यादा दर्द होता है लेकिन जैसे ही मासिकधर्म आता है यह दर्द कम होने लगता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर स्त्री को नियमित रूप से सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो कुछ ही समय में उसके ये लक्षण नज़र आना बंद हो जाते हैं।

गर्भावस्था की बहुत सारी परेशानियां जैसे उल्टी आने का मन करना, सिर में दर्द होना, गैस बनने के कारण दर्द होना आदि में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि बहुत ही चमत्कारिक तरीके से काम करती है। हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त लड़की जब गर्भवती होती है तो उस समय हिस्टीरिया रोग के कारण स्त्री को बहुत सारी परेशानियां घेर लेती है। बहुत से लोगों का मानना है कि गर्भवती स्त्री को बच्चे के जन्म से करीब 15-20 दिन पहले अगर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराया जाए तो उसको बच्चे के जन्म के समय किसी तरह की परेशानी नहीं होती और बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है, लेकिन यह किसी-किसी मामले में ही होता है क्योंकि हर गर्भवती स्त्री की प्रकृति एक ही तरह की नहीं होती, सभी के ल़क्षण अलग-अलग प्रकार के होते हैं और जब तक हर स्त्री के सारे लक्षण न मिले तो सिर्फ रोग या रोग के नाम पर 1 या 2 लक्षणों के आधार पर ही इस औषधि का इस्तेमाल करना सही नहीं कहा जा सकता, इसलिए इसे इतना लाभकारी नहीं कह सकते।

गर्भवती स्त्री के बच्चे के जन्म लेने के दर्द के शुरू होते ही (लेबर पैन) कंपकपी होना महसूस होना, हिस्टीरिया के लक्षण नज़र आते ही, बच्चे के जन्म लेने के दर्द के रुकते ही, गर्भाशय का मुंह न खुलना आदि लक्षण प्रकट होते ही उसे सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।

मासिकधर्म के दौरान स्त्रियों की स्नायुमण्डली (नर्वस सिस्टम) कमजोर हो जाती है इस हालत में अगर स्त्री को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि सब ऐन्टिसोरिक औषधियों का असर बहुत ही गम्भीर और चिरस्थाई होता है और अगर वो समलक्ष्ण विशिष्ट और उच्चशक्ति संपन्न हो तो बहुत ही प्रबल क्रिया के साथ रोग बढ़ सकता है। इसलिए एक बहुत ही महान व्यक्ति न पहले नक्सवोमिका का इस्तेमाल करके औषधि की शक्ति सहिश्णुता प्राप्त कर लेने के उपदेश दिये है, अगर ऐसा न किया जाए तो इस औषधि से पूरी तरह लाभ प्राप्त नहीं होगा। मासिकधर्म के दिनों में अगर स्त्री को कोई भयानक रोग घेर लेता है तो उसे ज्यादा ताकत वाली औषधियों का बार-बार सेवन नहीं करना चाहिए। इस हालत में स्त्री को नक्सवोमिका की एक खुराक देकर लक्षणों के आधार पर ही कुछ घंटों के बाद दूसरी औषधि दे देनी चाहिए।

सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी के गले में ऐसे लगना जैसे कि कुछ अटक रहा हो, सांस का रुक-रुककर चलना, सूखी खांसी होना जो रात को सोते समय ज्यादा चलती है आदि सांस के रोग के लक्षणो में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।

हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- नाड़ी का धीरे-धीरे चलना, बाजू सुन्न होना, ऐसा महसूस होना कि दिल की धड़कन बंद हो रही हो और दम सा घुट रहा है, बाएं स्तन के नीचे के हिस्से में दर्द होना आदि दिल के रोग के लक्षण प्रकट होने पर रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से कुछ ही समय में लाभ हो जाता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण- रीढ़ की हड्डी के ऊपर के हिस्से में छूने पर दर्द होना, गर्दन और कमर में खिंचाव सा आना, पसलियों के बीच के हिस्से में गठिया होना, कमर की पेशियों का ऐंठना आदि पीठ के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।

शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों में धीरे-धीरे बढ़ने वाला दर्द होना, शरीर में बैचेनी सी महसूस होना, पेट की पेशियों में गठिया होना, जनेन्द्रियों में खिंचाव के साथ हल्का-हल्का दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम पड़ जाता है।

वृद्धि-

सुबह के समय, सर्दी से, मासिकधर्म के दौरान, मासिकस्राव जितना ज्यादा होगा दर्द भी उतना ही ज्यादा होगा आदि मे रोग बढ़ जाता है।

शमन- 

गरमाई से, खाना खाने से रोग कम हो जाता है।

तुलना-

सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की तुलना रैमनस कैलिफोर्निका (रैम्नुस कैलीफोरनिका) डेरिस पिन्नाटा (डेरीस पिंनटा), आरिस्टोलोचिया मिलहोमेन्स (ऐरीस्टोलीकिक मील्गोमेंस) कौलोफाइलम, पल्सा, एगारिकस, मैकरोटिन आदि से की जाती है।

मात्रा -

सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की पहली से तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।


साइमेक्स CIMEX-CANTHIA

 साइमेक्स CIMEX-CANTHIA

परिचय-

जिस बुखार के अंदर शरीर टूटा-टूटा सा रहता है, किसी काम को करने का मन नहीं करता, नींद सी आती रहती है ऐसे लक्षण नज़र आते हो तो साइमेक्स औषधि बहुत लाभ करती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स औषधि का इस्तेमाल-

सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज दर्द होना, बहुत तेज गुस्सा आना, माथे की दाईं ओर की हड्डी के नीचे दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री की योनि से लेकर बाएं डिम्ब तक बहुत तेज दर्द होना जैसे की किसी ने कुछ चीज घुसा दी हो आदि स्त्री रोग के लक्षणों में स्त्री को साइमेक्स औषधि देने से आराम आता है।

बुखार से सम्बंधित लक्षण - शरीर में बहुत तेज ठण्ड लगने के साथ कंपकंपी होना, शरीर के सारे जोड़ों में दर्द होना, बदबू के साथ पसीना आना, बुखार के बढ़ने के साथ-साथ प्यास का कम होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ होता है। 

कब्ज से सम्बंधित लक्षण - 

पेट में कब्ज बनना, आंतों में सूखा मल जमा होना, मलान्त्र में जख्म होना आदि आंतों के रोग के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।

मात्रा-

रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स औषधि की छठी से 200 वीं शक्ति तक देने से आराम आता है।


सिनाबेरिस Cinabaris

 सिनाबेरिस Cinabaris

परिचय-

सिनाबेरिस औषधि किसी व्यक्ति की पलकों में स्नायूशूल के दर्द और गर्मी के कारण शरीर में पैदा हुए जख्मों को भरने में बहुत लाभकारी होती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिनाबेरिस औषधि का उपयोग-

रक्त से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति के अगर नाक से खून निकलता हो, आमाशय से खून बहता हो, बवासीर रोग के कारण खून ज्यादा बहता हो ऐसे लक्षणों में रोगी को सिनाबेरिस औषधि का सेवन कराना काफी लाभप्रद रहता है।

उपदंश, प्रमेह से सम्बंधित लक्षण- लिंग के मुंह का सूज कर फूल जाना, मस्से होना, खून निकलना, अण्डकोषों का बढ़ जाना आदि लक्षणों में अगर रोगी को सिनाबेरिस औषधि का सेवन कराया जाए तो लाभ होता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों में आंसुओं की नली से शुरू होकर दर्द का आंखों के चारो ओर की कनपटी तक फैल जाना, आंखों में किसी चीज का चुभना सा महसूस होना, आंख के अंदर के सफेद भाग का लाल हो जाना, आंखों से कम दिखाई देना, पलकों का सूज जाना, पुतलियों में निशान से पड़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिनाबेरिस औषधि दी जाए तो आराम मिलता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक की जड़ का भारी सा महसूस होना, नाक की जड़ पर दबाव पड़ना, पुराना सर्दी-जुकाम होने पर नाक से गोन्द की तरह लेसदार सा स्राव होना जो नाक के द्वारा गले में पहुंच जाता है आदि लक्षणों के आधार पर सिनाबेरिस औषधि का सेवन काफी लाभप्रद रहता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून जमा हो जाने के कारण होने वाला सिर का दर्द, रात को और दिन में हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना, जोड़ों में ठण्डापन महसूस होना, जोड़ों के आसपास खुजली सी महसूस होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनाबेरिस औषधि का प्रयोग कराने से आराम आता है।

प्रतिविष-

हिपर, सल्फ औषधि का उपयोग सिनाबेरिस औषधि के दोषों को दूर करने में किया जाता है।

पूरक-

थूजा।

वृद्धि-

शाम को, रात के समय, सोने के बाद, दाईं करवट लेटने से, छूने से, रोशनी से, सीलन से रोग बढ़ता है।

शमन-

खुली हवा में, रात को भोजन के बाद, सूरज की रोशनी से रोग कम हो जाता है।

तुलना-

हिपर, नाइट्रि-एसिड, थूजा, सीपिया से सिनाबेरिस औषधि की तुलना की जा सकती है।

मात्रा-

1, 3x, 30 और 200 शक्ति तक।


सिना Cina

 सिना Cina

परिचय-

सिना औषधि को बच्चों के रोगों के लिए एक बहुत ही असरदार औषधि माना जाता है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का उपयोग-

मन से सम्बंधित लक्षण- बच्चे का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी भी व्यक्ति के द्वारा छूने या गोद में लेने पर बच्चा रोने लगता है, बाहर ले जाते समय बच्चे का हर चीज लेने के लिए जिद्द करना, मन में हमेशा अपने ही आप को लेकर शर्म सी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सिना औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में बहुत तेज दर्द होना, अगर आगे की ओर झुका जाए तो सिर का दर्द कम हो जाता है, कोई भी नज़र का काम करते समय सिर में दर्द शुरू हो जाना आदि लक्षणों में सिना औषधि का सेवन काफी लाभप्रद रहता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की पुतलियों का फैल जाना, आंखों से हर चीज का पीला नज़र आना, ज्यादा हस्तमैथुन करने के कारण नज़रों का कमजोर हो जाना, आंखों का थका हुआ सा महसूस होना, आंखों के ऊपर की पेशियों में जलन होना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग करना काफी अच्छा रहता है।

कान से सम्बंधित लक्षण- कानों में ऐसा महसूस होना जैसे कि कोई कानों को खरोंच रहा हो या खोद रहा हो आदि लक्षणों में रोगी को सिना औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक में हर समय खुजली सी होते रहना, नाक को बार-बार हाथों से रगड़ते रहना, नाक के नथुनों को उंगलियों से खुरेचते हुए खून निकाल देना आदि लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का प्रयोग कराना अच्छा रहता है।

चेहरे से सम्बंधित लक्षण- गालों का बिल्कुल लाल हो जाना, चेहरे का रंग पीला पड़ जाना, आंखों के चारों ओर काले घेरे से पड़ जाना, चेहरे पर ठण्डा सा पसीना आना, सोते समय दांतों का पीसना, चेहरे और हाथों की पेशियों का सही तरीके से काम न करना आदि लक्षणों में सिना औषधि का सेवन करना लाभप्रद रहता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण- भोजन करने के कुछ देर बाद ही दुबारा भूख लग जाना, भोजन करने या पानी पीते ही तुरन्त उल्टी और दस्त हो जाना, उल्टी होने के साथ जीभ का साफ होना, बार-बार मीठी चीज खाने का मन करना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग काफी असरदार साबित होता है।

पेट से सम्बंधित लक्षण- नाभि के आसपास के भाग में मरोड़े उठने के साथ दर्द होना, पेट का फूल जाना और सख्त हो जाना आदि पेट के रोगों के लक्षण नज़र आने पर सिना औषधि का रोगी को सेवन कराना अच्छा रहता है।

मल से सम्बंधित लक्षण- मल के साथ सफेद आंव (सफेद पदार्थ) का आना, आंव (सफेद पदार्थ) आने से पहले पेट में दर्द होना, मलद्वार में खुजली होना, पेट में कीड़े होना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग काफी अच्छा रहता है।

मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रात को सोते समय पेशाब निकल जाना, पेशाब का गन्दे से रंग का आना जो कुछ देर बाद सफेद हो जाता है आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण- लड़की के जवानी की ओर कदम रखने से पहले ही योनि में से खून आना जैसे लक्षण नज़र आने पर सिना औषधि का प्रयोग लाभप्रद रहता है।

ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हल्की-हल्की सी ठण्ड लगते रहना, काफी तेज बुखार आना, भूख का ज्यादा लगना, पेट में दर्द होना, ठण्ड लगने के साथ प्यास का बढ़ जाना, माथे, नाक और हाथों पर ठण्डा सा पसीना आना आदि लक्षणों में सिना औषधि लेने से आराम मिलता है। 

नीन्द से सम्बंधित लक्षण- बच्चे का पेट के बल सोना, रात को सोते-सोते अचानक चौंक पड़ना, बार-बार चिल्लाना, जम्हाई लगते समय परेशानी होना, सोते समय दांतों को पीसते रहना आदि लक्षणों में सिना औषधि रोगी को खिलाने से आराम मिलता है।

शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों में झटके लगने के साथ टेढ़ापन सा आ जाना और कांपते रहना, रोगी को सोते-सोते बिस्तर पर से एकदम उछल पड़ना, बच्चे का हाथ-पैरों का पटकते रहना, रात को सोते समय बेहोशी के दौरे पड़ना, बच्चे का बाएं पैर को हर समय हिलाते रहना और उसमे ऐंठन आना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग करना काफी लाभकारी रहता है।

सांस से सम्बंधित लक्षण - सुबह उठने पर दम सा घोट देने वाली खांसी होना, बार-बार खांसी उठना, रोगी के खांसते-खांसते आंखों में से आंसू आ जाना और सीने में दर्द हो जाना, खांसते समय बाहर निकलने वाले बलगम का वापस अंदर निकल जाना, खांसी होने के बाद गले से लेकर आमाशय तक गड़गड़ाहट होना, खांसी के बाद चेहरे का पीला पड़ जाना, कमजोरी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।

वृद्धि-

किसी चीज की ओर लगातार देखते रहने से, कीड़ों से, रात को, धूप में, गर्मियों में रोग बढ़ जाता है।

शमन- 

हरकत करने से, पेट के बल लेटने से और आंखों को मलने से रोग कम हो जाता है।

प्रतिविष-

कैम्फर, कैप्सिकम आदि औषधियों का उपयोग सिना औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।

तुलना-

सिना औषधि की तुलना ऐन्ट-क्रूड, ऐन्ट-टार्ट, ब्रायो, कैमो, क्रियोज, साइली और स्टैफ के साथ की जा सकती है।

मात्रा-

सिना औषधि की 3 शक्ति तक रोगी को सेवन कराने से लाभ होता है।

जानकारी-

जो बच्चे बहुत चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं उन्हें सिना औषधि की 30 से 200 शक्ति तक देनी चाहिए।


सिनेरेरिया Cineraria

 सिनेरेरिया Cineraria

परिचय-

सिनेरेरिया औषधि आंखों के मोतियाबिंद के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। मोतियाबिंद को दूर करने के लिए इस औषधि की सिर्फ 1-1 बूंद ही रोजाना दिन में लगातार कई महीने तक 4-5 बार आंख में डालने से आराम आ जाता है। किसी तरह की चोट लगने पर भी ये औषधि अच्छा असर करती है।

तुलना-

मोतियाबिंद के रोग के लिए सिनरेरिया की तुलना फास्फी, नेट्रमम्यूरि, प्लाटेनस, कैनाबिस, कास्टिकम, नैफ्थालिन, लीडम, सिलीका आदि से की जाती है।


सिनकोना आफिसिनैलिस Cinchona Officinalis

 सिनकोना आफिसिनैलिस Cinchona Officinalis

परिचय-

सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि शरीर को कमजोर बनाने वाले स्रावों, जैवी द्रव्यों, खून और वीर्य आदि की कमी के कारण पैदा होने वाली कमजोरी के साथ होने वाली स्नायविक उत्तेजना में ये औषधि खासतौर से लाभदायक साबित होती है। इसके अलावा पुराना गठिया रोग, गुर्दे की श्लैष्मिक झिल्लियों की जलन में, कब्ज होने के रोग में भी ये औषधि असरदार साबित होती है। 

विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का उपयोग-

मस्तिष्क से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति का हमेशा उदास सा रहना, किसी से बात न करना, चिड़चिड़ा होना, नींद न आना, किसी की बात न मानना आदि दिमागी रोग के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।

सिर से सम्बंधित लक्षण - अचानक सिर का भारी हो जाना, ऐसा लगना कि जैसे किसी ने बहुत ज्यादा वजन सिर पर रखा हो, सिर में दर्द होना, चक्कर आना, जरा सा शोर होते ही सिर में बहुत तेज दर्द हो जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में अगर नियमित रूप से सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन किया जाए तो कुछ ही समय में रोगी को सिर के रोगों से छुटकारा मिल जाता है।

आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों के आसपास काले घेरे होना, आंखों का अंदर की तरफ धंस जाना, आंखों का पीला हो जाना, साफ नज़र न आना, आंखों के आगे ऐसे लगना कि जैसे अजीब-अजीब सी चीजें नाच रही हो, आंखों की रोशनी कम होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों के रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।

कान से सम्बंधित लक्षण - कानों में हर समय घंटी जैसी आवाजें गूंजना, ज्यादा तेज आवाज न सुन पाना, कम सुनाई देना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।

नाक से सम्बंधित लक्षण - अचानक नाक से खून आ जाना, पुराना जुकाम, छींकों के साथ जुकाम होना और नाक से स्राव होना, नाक के आसपास ठण्डा पसीना आना आदि नाक के रोगों के लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को नियमित रूप से सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि सेवन कराई जाए तो उसके लिए ये बहुत लाभकारी सिद्ध होती है।

मुंह से सम्बंधित लक्षण - मुंह के अंदर जीभ पर बहुत ज्यादा मैल जम जाना, जीभ की नोक में जलन होना और मुंह से लार का गिरना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, दांतों में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से आराम आता है।

आमाशय से सम्बंधित लक्षण- पेट में पूरी तरह से न पचे हुए भोजन का उल्टी के रूप में निकलना, भोजन का धीरे-धीरे पचना, भोजन करने के बाद पेट का भारी होना, तेज भूख लगने पर भी भोजन करने का मन न करना, पाचनतंत्र में दर्द होना, गैस बनना, उबकाई आना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।

उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण- पेट में गैस जमा हो जाने के कारण दर्द होना, पेट के नीचे के हिस्से में दर्द होना, पित्त की थैली में पथरी होने का दर्द, जिगर और तिल्ली का सूजना और बड़ा होना, पीलिया, आमाशय और पेट का अंदर से ठण्डा होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से पेट के सारे रोग समाप्त हो जाते हैं।

पुरुष से सम्बंधित लक्षण - अण्डकोश का बढ़ना, कामवासना का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, स्वप्नदोश होने के कारण शरीर में कमजोरी महसूस होना आदि पुरुष रोगों में सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।

स्त्री से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म समय से काफी पहले आ जाना, पेट का फूलना, मासिकस्राव ज्यादा मात्रा में आना और दर्द होना, कामवासना का बढ़ जाना, रक्तप्रदर आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ मिलता है।

सांस से सम्बंधित लक्षण- इन्फ्लुएंजा के साथ कमजोरी आना, सिर नीचा करने से सांस न आना, सांस का रुक-रुककर चलना, दम सा घुटना, छाती में से आवाज होना, भोजन करने के बाद बहुत जोरदार खांसी होना, फेफड़ों से खून आना, सांस लेने में परेशानी होना, दमा आदि सांस के रोगों के लक्षणों में सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि लेने से लाभ होता है।

हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- दिल का कमजोर होना, दिल का बहुत तेजी से धड़कना, दम सा घुटना, खून की कमी होना, बेहोशी छाना आदि दिल के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।

पीठ से सम्बंधित लक्षण- एक गुर्दे से लेकर दूसरे गुर्दे तक बहुत तेज दर्द होना जो हिलने से और तेज हो जाता है, कमर के आसपास के हिस्से में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।

चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाना, शरीर में ज्यादा पसीना आना, एक हाथ बिल्कुल ठण्डा तथा दूसरा हाथ बिल्कुल गर्म लगना, ग्रंथियों का कठोर हो जाना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से कुछ ही समय में उसे लाभ मिल जाता है।

शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों और जोड़ों में दर्द होना जो छूने से और ज्यादा बढ़ जाता है, जोड़ों का सूज जाना, कमजोरी, कंपन, शरीर का टूटा-टूटा सा लगना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ होता है।

नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा नींद आना, सुबह उठने पर शरीर का टूटा-टूटा सा लगना, हर समय जम्हाई आना, रात को अजीब-अजीब से सपने देखना, खर्राटे लेना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देनी चाहिए।

वृद्धि-

थोड़ा सा छूने से, ठण्डी हवा लगने से, हर दूसरे-तीसरे दिन रसरक्तादि धातुओं के निकलने से, भोजन करने के बाद, झुकने से रोग बढ़ता है।

शमन-

दोहरा होने से, जोर से दबाव देने से, खुली हवा में रहने से, गरमाई देने से रोग कम होता है।

तुलना-

सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि की तुलना आर्निका, क्विनीडिन, अलिन्द विकंपन, कैफालेन्थस आर्से, सेड्रा, नेट्रम-सल्फ्यु, सीडोनिया वुल्गैरिस, नक्स, इपिका से की जाती है।

मात्रा-

सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का मूलार्क या तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।